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tukbandi, and some!

ख़ुशबू पुण्डरीक की

मेरी क़िस्मत की है चाबी मेरे इसी विश्वास में,
कि राह भी हूँ मैं और रहगुज़र भी मैं,
मंज़िल भी मैं, फिर क्यूँ फिरूँ उदास-हताश मैं?

यादों के पार

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   हम मिलें हैं क्या? बंद दरवाज़ों के आर पार कभी? एक ख़्वाब में, जो शायद  कभी देखा ही नहीं? या ग़ज़ल में किसी जो अभी कहनी बाक़ी है? उस लफ़्ज़ में जो, अनबोला, मेरे…