Some shayari…

अब है सोचा कि तुझको न अब सोचेंगे
महज़ ख़याल की ख़ुशबू से महक उठते हैं।

सरे महफ़िल ख़ामोश ही रहते हैं हम
बात बे बात पे बेवजह चहक उठते हैं।

तेरी गलियों में आना यूँ छोड़ दिया
तेरे कूचे से जो गुज़रे तो बहक उठते हैं।

नशा तेरी नज़र का है या मयख़ाना?
ज़रा उठे तो सागर भी छलक उठते हैं।

तेरी आवाज़ में कहतें हैं वो है मौसीक़ी
जाने अनजाने से जज़्बात थिरक उठते हैं।

तेरी हँसी की खनक में है क़शिश ऐसी
मुस्कुराये तो कई शोले दहक उठते हैं।

सुना है तेरा आँचल जो छू जाए कहीं
बुत के सीने में अरमान धड़क उठते हैं।

दूर रहने में तुझसे है जो समझदारी
पास आने को क्यूँ ये क़दम उठते हैं?

पास आने की हिमाक़त हम करें कैसे
तुझसे दूरियों के कई सबब मिलते हैं।

बेतुकबंदी (2012)

 

 

Ab hai socha ki tujhko na ab sochenge

Mahaz khayaal ki khushboo se mahak uthte hain.

Sarre mehfil khaamosh hi rehte hain hum,

Baat be baat pe be-wajah chahak uthte hain.

Teri galiyon mein aana yu chhod diya,

Tere kuchche se jo guzre to bahak uthte hain…

… Paas aane ki himaaqat hum karein kaise?

Tujhse dooriyon ke kai sabab milte hain!